आपका स्वास्थ्य
Thursday, August 19, 2021
प्लेटलेट्स कम होने के कारण और निवारण
हमारे खून में तीन तरह की कोशिकाएं होती हैं -लाल रक्त कोशिकाएं, सफेद रक्त कोशिकाएं और प्लेटलेट। प्लेटलेट्स रक्त कोशिकाओं के छोटे-छोटे टुकड़े होते हैं, जो खासतौर पर बोनमैरो में पाए जाते हैं। प्लेटलेट्स को थ्रोम्बोसाइट्स भी कहा जाता है। प्लेटलेट्स ब्लड कलोटिंग यानि खून के थक्के जमाने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। एक स्वस्थ व्यक्ति में सामान्य प्लेटलेट काउंट 1,50 हजार से 4,50 हजार प्रति माइक्रोलीटर होता है। जब यह काउंट 1,50 हजार प्रति माइक्रोलीटर से नीचे चला जाये तो इसे लो प्लेटलेट माना जाता है। आनुवंशिक रोगों, कुछ प्रकार के कैंसर, कीमोथेरेपी ट्रीटमेंट, कुछ दवाओं के सेवन व बुखार जैसे डेंगू, मलेरिया व चिकनगुनिया के होने पर भी ब्लड प्लेटलेट्स की संख्या कम हो जाती है।
किन कारणों की वजह से प्लेटलेट्स कम होता है-
स्प्लीन के बढ़ने से
पसलियों के नीचे स्प्लीन नाम का एक छोटा-सा अंग होता है, जो संक्रमण से लड़ाई करता है। स्प्लीन हमारे खून में मौजूद अवांछित तत्वों को फिल्टर करता है। बढे हुए स्प्लीन में काफी प्लेटलेट्स जमा हो जाते हैं, जिसे स्प्लीन रोक कर रखता है। इससे प्लेटलेट्स की संख्या में कमी आ जाती है।
प्लेटलेट्स के उत्पादन में कमी
प्लेटलेट्स बोनमैरो में बनते हैं और कुछ कारणों की वजह से थ्रोम्बोसाइटोपेनिया (प्लेटलेट्स की कमी) विकसित हो सकती है। थ्रोम्बोसाइटोपेनिया कई कारणों से हो सकता है, जैसे- ल्यूकेमिया, अप्लास्टिक एनीमिया, हेपेटाइटिस सी, एड्स, कीमोथेरेपी, दवाइयां और शराब का अत्यधिक सेवन।
प्लेटलेट्स का तेजी से टूटना
कई बार हमारे शरीर में ऐसी स्थिति बनती है कि बोन मैरो शरीर में पर्याप्त प्लेटलेट्स तो बनाते हैं, लेकिन हमारा शरीर उन्हें नष्ट कर देता है या उनका उपयोग कर लेता है। इससे भी खून में प्लेटलेट्स की कमी हो सकती है।
प्लेटलेट्स बढ़ाने के उपाय
ऐसे कई खाने की चीज़ें होती है जिनसे प्लेटलेट्स बढ़ाने में मदद मिलती है। प्लेटलेट्स की कमी में इन चीज़ों के सेवन से प्लेटलेट्स बढाने में बहुत मदद मिलती है-
चुकंदर
चुकुंदर का सेवन प्लेटलेट्स बढ़ाने के लिए काफी असदार होता है। चुकुंदर में भरपूर मात्रा में एंटी-ऑक्सीडेंट्स मौजूद होते हैं जो प्लेटलेट्स बढ़ाने में मदद करते हैं। यह शरीर की रोग प्रतिरोधी क्षमता को भी मजबूत बनाता है। चुकुंदर के रस को गाजर के रस के साथ मिलाकर पीने से प्लेटलेट्स बढ़ते हैं। आप चाहें तो चुकुंदर की सब्जी बनाकर खा सकते हैं।
पपीता
प्लेटलेट्स बढ़ाने के लिए पपीते का फल ही नहीं, उनकी पत्तियां भी मददगार हैं। डेंगू बुखार में प्लेटलेट्स कम होने पर पपीते के पत्ते के रस के सेवन से बहुत फायदा होता है। तेजी से बढ़ाया जा सकता है। नियमित रूप से पपीता खाने से प्लेटलेट्स बढ़ाने में मदद मिलती है। आप चाहें तो पपीते की पत्तियों को चाय की तरह भी पानी में उबालकर पी सकते हैं।
आंवला
आंवले का सेवन प्लेटलेट्स बढ़ाने के बेहद पुराने उपायों में से एक है। आंवले में भरपूर मात्रा में विटामिन-सी मौजूद होता है जो शरीर में प्लेटलेट्स का उत्पादन बढ़ाता है। इसके साथ ही आंवले के नियमित सेवन से शरीर की रोग प्रतिरोधी क्षमता भी बढ़ती है। आप चाहें तो आंवलें को फल के रूप में कच्चा ही खा सकते हैं या इसका जूस भी पी सकते हैं।
गिलोय
गिलोय के जूस का सेवन प्लेटलेट्स बढ़ाने के लिए किए जाने वाले सबसे प्रचलित उपायों में एक माना जाता है। इससे प्लेटलेट्स तो बढ़ते ही हैं, लेकिन इसके साथ ही शरीर की प्रतिरोधक क्षमता भी मजबूत होती है। गिलोय के चूर्ण को शहद के साथ मिलाकर दिन में दो बार लें, इससे प्लेटलेट्स की संख्या जल्दी बढ़ेगी। आप चाहें तो गिलोय की डंडी को रात भर पानी में भिगोकर सुबह उसका छना हुआ पानी पी सकते हैं।
नारियल पानी
नारियल पानी के सेवन से भी प्लेटलेट्स बढ़ाने में मदद मिलती है। नारियल पानी में इलेक्ट्रोलाइट्स और मिनरल्स की भरपूर मात्रा होती है। इससे शरीर में प्लेटलेट्स की कमी को पूरा करने में मदद मिलती है। प्लेटलेट्स की कमी में रोजाना नारियल पानी का सेवन करना बेहद फायदेमंद होता है।
नोट: इस लेख के सुझाव सामान्य जानकारी के लिए ही हैं, इन सुझावों और जानकारी को किसी डॉक्टर या मेडिकल प्रोफेशनल की सलाह के तौर पर न लें। किसी भी बीमारी के लक्षणों की स्थिति में डॉक्टर की सलाह जरूर लें।
वैद्य एस.के. यादव
Saturday, January 5, 2019
सर्दियों में अपने दिल का रखें खास ख्याल
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| हार्ट-1 |
सर्दी अपने साथ स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव भी लेकर आती है, इस बात को ध्यान में रखते हुए आपको यह बताना जरूरी है कि आप खुद को बीमारियों से बचाते हुए सर्दियों का पूरा मजा कैसे लें।
"यह माना हुआ तथ्य है कि सर्दियों में दिल और दिमाग के दौरे व कार्डियक अरेस्ट "हृदय गति रुकना" की वजह से मृत्यु दर बढ़ने लगती है। इसके कई कारण है।
"पहला तो दिन छोटे हो जाते हैं जिससे हार्मोन्स में असंतुलन पैदा होता है और शरीर में विटामिन डी की कमी आती है जिससे दिल और दिमाग इसका प्रभाव पड़ने की प्रबल संभावना होती है।"
ठंडे मौसम में दिल की धमनियां सिकुड़ जाती हैं जिससे दिल को रक्त और ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। इससे ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। ठंडे मौसम में खास कर उम्रदराज लोगों को अवसाद घेर लेता है, जिससे उनमें तनाव और हाईपरटेंशन काफी हद तक बढ़ जाता है।
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| हार्ट-2 |
सर्दियों के अवसाद से पीड़ित लोग अक्सर ज्यादा चीनी, ट्रांस फैट और सोडियम व ज्यादा कैलोरी वाला आरामदायक भोजन खाने लगते हैं जो मधुमेह और हाइपरटेंशन से पीड़ित लोगों के लिए यह बहुत ही खतरनाक हो सकता है।
इन बातों का रखें ध्यान
1- उचित मात्रा में पानी पीने से ऊर्जा के साथ साथ पाचन बेहतर बना रहता है। अपने दिन की शुरुआत नाश्ते से पहले आधा लीटर पानी पीकर करें और हर घंटे बाद उचित मात्रा में पानी पीते रहें। प्ररन्तु खाने के तुरंत बाद पानी न पिएं गुनगुना पानी ही पीने का प्रयास करें।
2- अच्छी सेहत के लिए सोलेबल और इनसोलेबल फाइबर से भरपूर आहार लें, जिसमें इसबगोल का छिलका, सेब, ओन ब्रैन और दालें खाएं। इनसोलेबल में संपूर्ण अनाज, ब्रोकली, सूखे मेवे, सीडज और वेजीटेबल स्किन शामिल होते हैं। फाईबर कई गंभीर बीमारियों से रक्षा करता है। फाइबर अपच सिंड्रोम में भी मदद करता है।
3- कच्चे फल, सब्जियां, अंकुरित अनाज, सूखे मेवे, बीज और ताजा जड़ी बूटियां अपने आहार में शामिल करें। कच्चे आहार एनजाइम, विटामिन और रोग प्रतिरोधक एंटीऑक्सीडेंट प्रदान करते हैं।
4- खूब धूप सेकें। 80 से 90 प्रतिशत लोग विटामिन डी की कमी से पीड़ित हैं जो सर्दी के अवसाद, जोड़ों के दर्द, रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी का कारण बनता है। इसलिए सर्दियों में काफी धूप लें।
5- अच्छे भोजन में सात रंग और 6 स्वाद शामिल होते हैं। लाल सेब लाईकोपीन, हरी पत्तेदार सब्जियों और फलों में बी काम्पलेक्स और नारंगी वस्तुओं से विटामिन सी मिलता है। इसी तरह मीठे, कसैले और नमकीन स्वाद वजन बढ़ाते हैं, तीखे, खट्टे और कड़वे स्वाद वजन कम करते हैं।
6- अगर आप धूम्रपान करते हैं तो छोड़ें! धूम्रपान वालों में अस्थमा और सांस की बीमारियां सर्दियों में आम हो जाती हैं जो दिल के दौरे का खतरा भी बढ़ाती हैं।
अत: खुद को निरोगी बनाए रखने के लिए उपरोक्त बातों का ध्यान रखें और स्वस्थ रहें वैसे आधा से एक घंटे योग एवं प्राणायाम जरूर करें कोहरे में कतई घूमने न जायें। अगर बाहर जाना पडे तो सर, कान नाक ढक कर जायें व पैरों में जूते जरूर पहनकर रखें। स्वस्थ जीवन जिएं।
राधे राधे
वैद्य सुदेश यादव दिव्यमो. 9027687780
Thursday, January 3, 2019
गुणकारी जामुन
जामुन काले रंग का मौसमी फल होता है, इसका रंग भले ही काला है लेकिन इसमें गुण कमाल के होते है। खाने में स्वादिष्ट होने के साथ साथ ही इसमें कई औषधीय गुण भी मौजूद हैं। वैसे तो जामुन अम्लीय प्रकृति का फल है, पर यह स्वाद में मीठा होता है। जामुन में भरपूर मात्रा में ग्लूकोज और फ्रुक्टोज पाया जाता है। जामुन में लगभग वे सभी जरूरी लवण पाए जाते हैं जिनकी हमारे शरीर को आवश्यकता होती है। जामुन पेट के लिए तो बहुत ही फायदेमंद होती है। जामुन खाने से पेट से जुड़ी कई तरह की समस्याएं दूर हो जाती हैं। शुगर के मरीजो के लिए जामुन एक बहुत अच्छी दवा है। जामुन के बीजों को सुखकर पीसकर रख ले और इस पाउडर को खाने से मधुमेह में काफी फायदा होता है। शुगर के अलावा इसमें कई ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो कैंसर तक से बचाव में कारगर होते हैं। इसके अलावा पथरी की रोकथाम में भी जामुन खाना बहुत ही फायदेमंद होता है। इसके बीज को बारीक पीसकर पानी या दही के साथ लेना चाहिए। अगर किसी को दस्त हो रहे हों तो जामुन को सेंधा नमक के साथ खाना पेट के लिए फायदेमंद रहता है, खूनी दस्त होने पर भी जामुन के बीज बहुत फायदेमंद साबित होते हैं। दांत और मसूड़ों से जुड़ी कई समस्याओं के समाधान में जामुन विशेषतौर पर फायदेमंद ही साबित हुआ है। इसके बीज को पीसकर इससे मंजन करने से दांत और मसूड़े स्वस्थ बने रहते हैं।
अत: अनेकों गुण से भरपूर जामुन के प्रयोग के साथ साथ हम कुछ योग और प्राणायाम को अगर अपने जीवन में अपना लेते हैं और नियमित रूप से अपनी दिनचर्या में शामिल कर लेते हैं, तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि हम मधुमेह जैसे असाध्य कहे जाने वाले रोग को भी मात दे सकते हैं। बस जरूरत है तो सिर्फ हमारे दृढ संकल्प की, हमारी अटूट इच्छाशक्ति की, या हमारे जागरूक होने की।
वैद्य सुदेश यादव दिव्ययोगगुरू, कवि
मो09368666665
Wednesday, December 19, 2018
आधुनिक सभ्यता का अभिशाप बना मधुमेह रोग
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| मधुमेह के दुष्परिणाम- 1 |
जनवरी, 2004 में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली में “डायबिटीज और रिह्यूमेटोलोजी” पर आधारित सेमिनार में डायबिटीज पर संस्थान द्वारा किए गए शोध का हवाला देते हुए बताया गया कि 14 से 25 साल की उम्र के लोगों में यह बीमारी तेजी से बढ़ रही है। कारण है मोटापा और आरामतलब लाइफ स्टाइल। स्कूलों में पिज्जा, चिप्स, कोल्ड ड्रिंक्स के ज्यादा इस्तेमाल के साथ आम खान-पान में रिफाइंड खाना, पालिश किए गए खाद्य पदार्थ और खाने में फाइबर की कमी डायबीटीज की बढती संख्या का मुख्य कारण हैं।
मधुमेह का वैज्ञानिक परिचय क्या है?
मधुमेह को बैज्ञानिक शब्दावली में डायबिटीज मेलाइट्स के नाम से जाना जाता है यह यूनानी भाषा के शब्द ‘डाइबिटीज’ का अर्थ लैटिन भाषा के शब्द ‘मेलाइट्स’से मिलकर बना है। ‘डाइबिटीज’ का अर्थ है–होकर निकलना या प्रवाहित होना तथा ‘मेलाइट्स’ का अर्थ है मधु। इस प्रकार डाइबिटीज मेलाइट्स का अर्थ हुआ मधु का प्रवाहित होना।
यह रोग शरीर की कार्यरिकी में हुई गड़बड़ियों के परिणाम स्वरुप उत्पन्न होता है इसे शरीर के चयापचय से संबंधित एक रोग के रूप में जाना जाता है जो अग्नाशय में स्थित विशेष लैंगरहैंस द्विपिकाओं द्वारा एक विशिष्ट हारमोन इन्सुलिन का पर्याप्त मात्रा में निर्माण न कर पाने के कारण होता है। यह हार्मोन शरीर को शर्करा के सामान्य प्रयोग के लिए समर्थ बनाता है। इसकी कमी के फलस्वरूप रक्त में शर्करा की मात्रा बढ़ जाती हैं जब यह एक निर्धारित स्तर तक पहुँच जाती है तो गुर्दे इसके अतिरिक्त मात्रा को मूत्र में निष्कासित कर देते हैं। इसलिए रक्त शर्करा की अधिक मात्रा की जाँच के लिए चिकित्सकों द्वारा मूत्र के परिक्षण का परामर्श दिया जाता है मोटे शब्दों में कहें तो डायबिटीज का अर्थ है रक्त में चीनी की मात्रा का बढ़ जाना, जो इन्सुलिन के निर्माण में गड़बड़ी से होता है। इन्सुलिन का काम रक्त में चीनी के स्तर को नियंत्रण करना है।
भारत में मधुमेह की स्थिति
पूरे विश्व में मधुमेह का फैलाव बढ़ रहा है। आज विश्व के 3 प्रतिशत से 12 प्रतिशत लोग या तो मधुमेह सी पीड़ित हैं अथवा उनके मधुमेह से पीड़ित होने की संभवना है। समाचार पत्रों में प्रकाशित “विश्व स्वास्थय संगठन” की एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार “ सन 2025 तक भारत दुनिया का डायबिटीक कैपिटल हो जाएगा। यानि उस वक्त तक डाइबिटीज के सबसे अधिक रोगी भारत में होंगे और उनकी संख्या यहाँ लगभग 5.7 करोड़ होगी। जहाँ तक देश की राजधानी दिल्ली का सवाल है तो यहाँ की कुल आबादी (लगभग 1.45 करोड़ ) के 12 फीसदी लोग डाइबिटीज के घोषित मरीज हैं”“भारतीय मधुमेह संगठन” के अनुसार शहरी जीवन शैली में बदलाव, अधिक मसालेदार भोजन, कम व्यायम, बढ़ता तनाव, जेनेटिक तथा पर्यावरणीय कारणों से मधुमेह का खतरा 60% तक अधिक बढ़ जाता है । मधुमेह के रोगियों में अन्य रोगियों की तुलना में हृदयघात का तीन गुना अधिक हो जाता है ।
उपर्युक्त आंकड़े यह स्पष्ट संकेत करते हैं की मधुमेह एक गंभीर समस्या के रूप में उभर कर हमारे सामने आया है ।
समाचार पत्रों में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग चार करोड़ भारतीय मधुमेह के साथ जी रहे हैं ।
क्या भारत में मधुमेह रोग अभी फैला है?
भारत में मधूमेह का इतिहास काफी पुराना है। ईसा पूर्व पाँचवी शताब्दी में भारत के प्रसिद्ध चिकित्सा विज्ञानी सूश्रूत ने मधूमेह का वर्णन किया था। उन्होंने कहा था कि इस रोगी का मूत्र मीठा हो जाता है। मधुमेह से बचने के लिए उनहोंने उपवास, मीठे पदार्थों से परहेज तहत जड़ी-बूटियों के सेवन की सलाह की थी।
बच्चों, युवा एवं वयस्क पुरूषों/महिलाओं में से मधुमेह किसे अधिक प्रभावित करता है? हालाँकि मधुमेह बच्चों को उतना प्रभावित नहीं करता जितना की वयस्कों को प्रभावित करता है। ऐसा देखा गया है कि मधुमेह से पीड़ित वयस्क प्राय: 45 वर्ष से 55 वर्ष तक की आयु के मध्य के होते हैं। मधुमेह से ग्रस्त युवाओं में प्राय: वंशानुगत कमजोरी होती है तथा कई बार तो यह कमजोरी अत्यधिक गंभीर हो जाती है। मधुमेह से ग्रस्त तीन लोगों में से दो महिलाएँ होती हैं। आविवाहित स्त्रियों की अपेक्षा विवाहित स्त्रियों में मधुमेह का प्रतिशत बहुत अधिक पाया जाता है इसका कारण अभी तक स्पष्ट नहीं हो सका है पर ऐसा माना जाता है कि इसका संबंध गर्भावस्था के दौरान होने वाले ग्रंथिमय परिवर्तनों से है। ये परिवर्तन शरीर द्वारा स्टार्च और शर्करा का इस्तेमाल किए जाने के तरीकों को प्रभावित कर सकते हैं।
मधुमेह किन लोगों में अधिक पाया जाता है?
मधुमेह ऐसे लोगों में प्राय: अधिक पाया जाता है जो कार्यालय के बैठे रहने वाले कामकाज उत्पन्न मानसिक तनाव से थक जाते हैं या जो अपने कार्यों की आधिकता की वजह से प्राय: तनावग्रस्त रहते हैं तथा जिनके पास व्ययाम करने के लिए समय का अभाव होता है। मधुमेह दुबले-पतले की अपेक्षा मोटे लोगों को अधिक प्रभावित करता है। आधुनिक वैज्ञानिक खोजें इस तथ्य की ओर संकेत करती हैं कि मधुमेह के प्रादुर्भाव में मानसिक कारणों का बहुत बड़ा योगदान है। अत्यधिक तनाव, किसी अत्याधिक प्रिय का वियोग तथा नौकरी एवं व्यवसाय की बार-बार की तकलीफें कई बार स्वास्थ्य को प्रभावित करके प्रत्यक्ष रूप से अमाशय संबंधी गंभीर गड़बड़ियां उत्पन्न कर देती हैं जिसका परिणाम मधुमेह के रूप में हमारे सामने आता है। यही नहीं कई बार कतिपय दवाएँ भी व्यक्ति को अस्थायी मधुमेह का शिकार बना देती हैं ।
ऐसा देखा गया है कि उन लोगों में मधुमेह का पूर्व इतिहास होने की संभावना अधिक होती है जिनके परिवार में मधुमेह का पूर्व इतिहास रहा हो या जो मोटापे से ग्रस्त हों। “विश्व स्वास्थय संगठन” ने भी मोटापे को मधुमेह का एक बड़ा कारण माना है। इसके अलावा ऐसे व्यक्ति जिनके रक्त में शर्करा का स्तर तनाव की स्थिति में सामान्य से अधिक हो जाता है तथा बार–बार गर्भपात कराने वाली तथा जन्मजात विकृतियों से ग्रस्त बच्चों को जन्म देने वाली महिलाओं में भी मधुमेह की संभावना अधिक होती है।
मधुमेह के प्रमुख लक्षण क्या हैं?
मधुमेह का सर्वप्रमुख लक्षण बार-बार मूत्रत्याग की इच्छा का प्रकट होना है। अन्य लक्षणों में अत्यधिक प्यास लगना (रोगी का मुख सूख जाता है तथा वह अपर्याप्त पानी की शिकायत करता है ) भूख, वजन कम होना, जल्दी थक जाना, चोट एवं घाव का धीरे-धीरे भरना, नेत्रज्योति में परिर्वतन, शरीर के कुछ स्थानों पर तीव्र खुजली, उँगलियों एवं पैर के अंगूठे में दर्द तथा दुर्बलता एवं उनींदापन आदि मुख्य हैं।मधुमेह के साथ प्राय: पैरों के रक्त प्रवाह में बाधा उत्पन्न होने की प्रवृति होती है। इसके साथ ही विषक्त स्थितियों जैसे फोड़े आदि के प्रति प्रवणता होती है। कई बार पैर पर लगी हुई एक चोट मधुमेह व्रण में बदल सकती है और जब तक रक्त में शर्करा की बहुलता है इस व्रण का ठीक हो पाना कठिन जो जाता है परिणामस्वरूप मधुमेह से ग्रस्त व्यक्ति के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह अपने पैरों एवं त्वचा की अच्छी तरह से देखभाल करे तथा उसे चोट-चपेट से बचाए। मधुमेह से ग्रस्त व्यक्ति को अपने बाह्य परिधीय रक्त परिसंचरण की देखरेख के लिए हरसंभव प्रयास करना चाहिए। उसे व्रण व्यक्ति को अपने बाह्य परिधीय रक्त परिसंचरण की देख-रेख के लिए हरसंभव प्रयास करना चाहिए। उसे धूम्रपान तुरंत छोड़ देना चाहिए क्योंकि धूम्रपान से रक्त परिसंचरण तंत्र की पतली रक्त वाहिकाओं और कोशिकाओं में संकुचन उत्पन्न होता है। इसलिए मधुमेह से ग्रस्त रोगियों को अपने पैरों और अंगों को गर्म रखने की व्यवस्था रखनी चाहिये ।
इसके अतिरिक्त मधुमेह के और भी अनेक लक्षण हैं जैसे-
पीठ का तिरछापन
टांगों में भारीपन
सुन्न और सूजे हुए पैर
अत्यधिक प्यास
कमर में कड़ापन
नपुंसकता
बीच बीच में अपच की शिकायत
उत्तेजक पदार्थों को खाने की इच्छा
मुंह में शुष्कता
गुर्दों में पीड़ा का अनुभव
क्षय रोग का बुखार
उदासीनता
निराशापूर्ण मानसिक स्थिति
मौन विषाद
दुर्बलता
मोटापा एवं ग्लानि आदि
मधुमेह का निदान कैसे होता है?
मधुमेह के प्रौढ़ रोगियों में प्रारंभिक अवस्था में सामान्यता: मधुमेह का कोई लक्षण दिखाई नहीं देता। ऐसे रोगियों में मधुमेह का निदान अचानक ही होता है जैसे:-
- दुर्घटना हो जाने पर
- आपरेशन कराने से पूर्व
- किसी अन्य रोग के निदान के लिए परिक्षण कराने पर
प्राय: मधुमेह के लक्षण इतने धीरे-धीरे प्रकट होते हैं कि साधारणत: रोगी का ध्यान उनकी तरफ नहीं जाता। मूत्र और रक्त में शर्करा की जाँच कराने पर ही अचानक रोग का पता चलता है। इसीलिए मधुमेह का पारिवारिक इतिहास रखने वाले व्यक्तियों तथा प्रौढावस्था में पहुँचने पर सभी व्यक्तियों को मधुमेह का कोई लक्षण न दिखायी देने पर भी मूत्र और रक्त की जाँच साल में एक–दो बार करा लेने की सलाह चिकित्सा द्वारा दी जाती है ।
मधुमेह के निदान के लिए कौन-कौन से परिक्षण किए जाते हैं?
मधुमेह के निदान के लिए कई परिक्षण किए जाते हैं। जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं –
- बेनेडिक्ट टेस्ट
- ग्लूकोज आक्सीडेज टेस्ट
- खाली पेट रक्तशर्करा की जाँच
- भोजन लेने या 75 से 100 ग्राम ग्लूकोज लेने के बाद रक्त शर्करा की जाँच
- ग्लूकोज टोलरेंस टेस्ट
क्या घर में भी रक्त शर्करा की जाँच की जा सकती है?
हाँ। ग्लूकोमीटर उपकरण की सहायता से रक्त के स्तर की जाँच घर में भी की जा सकती है लेकिन ग्लूकोमीटर की प्रमाणिकता पर सदैव सवाल उठते रहे हैं इसलिए लैब पर जांच कराना ही बेहतर होगा।
मधुमेह होने के कुछ और भी कारण हैं?
मधुमेह होने के कुछ द्वितीयक कारण भी हो सकते हैं। जिनमें से प्रमुख निम्न हैं–
- आनुवांशिक कारण
- अग्नाशय शोथ
- औषधियों के सेवन से उत्पन्न कारण
- मानसिक तनाव एवं चिंता
- शारीरक श्रम का अभाव या श्रम रहित दिनचर्या
- गलत रहन-सहन
मधुमेह के लिए उत्तरदायी अन्य कारणों में व्यायाम के अभाव एवं खान-पान में बदलाव के कारण तेजी से बढ़ता मोटापा, त्वरित गति से होता शहरीकरण, बढती सुविधाओं के कारण व्ययाम की कमी, परिष्कृत, गरिष्ट एवं तामसिक आहार, फ़ास्ट फ़ूड का अधिक प्रयोग तथा तनावपूर्ण जीवनचर्या आदि प्रमुख हैं। किसी व्यक्ति में लगातार रहने वाला भावनात्मक तनाव रक्त प्रवाह में हर्मोस की क्रमशः वृद्धि करता रहता है जो अंतत: रक्त शर्करा के स्तर को बढ़ा कर मधुमेह का कारण बनता है।
क्या मधुमेह कई तरह के होते है?
मधुमेह को दो प्रमुख वर्गों में वर्गों में वर्गीकृत किया गया है। ये हैं–
टाइप वन– इन्सुलिन पर निर्भर मधुमेह
टाइप टू– इन्सुलिन पर अनिर्भर मधुमेह
पहले वर्ग में किसी भी कारणवश अग्नाशय पर्याप्त मात्रा में इन्सुलिन का निर्माण नहीं कर पाता है। फलस्वरूप ऐसे रोगियोँ को इन्सुलिन देकर शर्करा के चयापचय के योग्य बनाया जाता है। इसलिए इस वर्ग के रोगियों को टाइप वन मधुमेही या इन्सुलिन पर निर्भर मधुमेही कहते हैं। यह प्राय: बच्चों तथा युवाओं में पाया जाता है। इसे जूवेनाइल डायबिटीज भी कहते हैं। अधिक आयु वर्ग के लोग भी इससे पीड़ित हो सकते हैं।
इस वर्ग में अग्नाशय से पर्याप्त इन्सुलिन निकलता तो है लेकिन वह ठीक से इस्तेमाल नहीं हो पाता। ऐसे रोगियों को खाने वाली दवाएँ देकर शर्करा के चयापचय के योग्य बनाया जाता है। इसलिय इस वर्ग के रोगियों को टाइप टू मधुमेही या इन्सुलिन पर अनिर्भर मधुमेही कहते हैं। यह अधिकतर प्रौढ़ावस्था में होता है। पर जीवन शैली में होने वाले नकारात्मक परिवर्तनों के फलस्वरूप अब यह किशोरों और बच्चों में भी पाया जाने लगा है। इस वर्ग के रोगी अधिकांशत: मोटापे से ग्रस्त होते हैं। रोगियों में रोग के लक्षण धीरे-धीरे प्रकट होते हैं तथा कई बार तो इस प्रक्रिया में वर्षों लग जाते हैं।
जयपुर मेडिकल एसोसिएशन की ओर से जनवरी 1997 में “मधुमेह के उपचार में नवीनतम विकास” विषय पर आयोजित एक गोष्टी में अमेरिका के मेयो क्लिनिक एंड मेडिकल स्कूल के बारे में बताया गया कि यदि फास्टिंग ग्लूकोज का स्तर 200 मिलीग्राम से कम हो तो दवा के स्थान पर व्यायाम, भोजन पर नियंत्रण और आहार में परिवर्तन लाकर रोग का उपचार करना चाहिए। उन्होंने बताया की भारत में अमेरिका से अधिक वृद्ध अवस्था वाले मधुमेह रोगी हैं। उनका कहना था की रोग से बचाव के लिए उच्चरक्तचाप, धूम्रपान, मोटापा और रक्त में कोलेस्ट्रोल की मात्रा पर नियंत्रण रखना चाहिए ।
इसके आतिरिक्त तनाव जन्य मधुमेह भी काफी उभर कर सामने आ रहा है। कई चिकित्सा इसको एक अलग वर्ग के रूप में मान्यता देते हैं।
प्री- डायबिटीज क्या हैं?
प्री- डायबिटीज उन लोगों को कहते हैं जिनके रक्त में चीनी की मात्रा ज्यादा होती है। पैरों और साँस से आ रही बदबू से ऐसे लोगों की पहचान की जा सकती है। मधुमेह की रोकथाम के लिए ऐसे लोगों की पहचान पर आज डाक्टरों द्वारा ज्यादा जोर दिया जा रहा है।
मधुमेह की जटिलताएँ क्या-क्या हैं?
मधुमेह एक ऐसा रोग है जिसकी जटिलताएँ काफी अधिक हैं। इन जटिलताओं लापरवाही बरतने पर ये रोगी को काफी हानि पहुँचा सकती हैं इन जटिलताओं में प्रमुख हैं –
- रोगी को बार-बार संक्रमण होना
- घाव होने पर आसानी से न भरना
- दृष्टि पटल विकृति
- तंत्रिका विकृति
- मधुमेह कीटोन अम्ल्यता
- हृदय वाहिकीय विकृति
मूत्रमार्ग का संक्रमण मधुमेह से ग्रस्त व्यक्ति के शरीर में क्या प्रक्रिया होती है?
जब हम शर्करा को समुचित रूप से इस्तेमाल नहीं करते तो हमें अधिक भूख महसूस होती है क्योंकि शरीर को ऊर्जा देने वाले भोजन की आवश्यकता होती है। रक्त शर्करा कार्बोहाइड्रेट युक्त खाद्यपदार्थ शर्करा एवं स्टार्च का व्यूप्तपाद्य है। भोजन के पाचन के फलस्वरूप स्टार्च शर्करा में परिवर्तित हो जाते हैं। एक साधारण व्यक्ति में शर्करा की तत्कालिक आवश्यकता से ऊपर की अतिरिक्त मात्रा संग्रहित कर ली जाती है जबकि मधुमेह से ग्रस्त व्यक्ति में यह क्रिया सफलतापूर्वक संपन्न नहीं हो पाती इसलिए गुर्दों को शर्करा की अतिरिक्त मात्रा को मूत्र उत्सर्जन तंत्र के द्वारा शरीर से बाहर निकलना पड़ता है।
मधुमेह के संदर्भ में कई बार इन्सुलिन का उल्लेख आता है। यह इन्सुलिन क्या है?
इन्सुलिन एक हार्मोन है जो अग्नाशय की कोशिकाओं में उत्पन्न होता है। रक्त परिसंचारण में स्रावित किए जाने पर यह उपापचय एवं शर्करा की उपयोगिता का अवसर देता है। इसकी खोज 1921 में हुई थी। उससे पहले मधुमेह से ग्रस्त व्यक्तियों के लिए इलाज की बहुत ज्यादा गुंजाइश नहीं थी। इन्सुलिन का आविष्कार होने पर इसे मधुमेह से पीड़ित लोगों के लिए जीवनदायी औषधि माना गया ।
ऐसा माना जाता है कि इन्सुलिन, मधुमेह से पीड़ित व्यक्तियों को भी अन्य व्यक्तियों की तरह सामान्य जीवन जीने का असवर प्रदान करती है पर इसके लिए यह आवश्यकता है की मधुमेह से ग्रस्त व्यक्ति खाने-पीने के बारे में कुछ पूर्व निश्चित नियमों का पालन करे और इन्सुलिन की निर्धरित मात्रा अपने शरीर में पहूँचाता रहे। भोजन नियंत्रण में ऐसे व्यक्ति को मादक द्रव्यों एवं मिठाइयों आदि से स्थायी रूप से दूर रहने के लिए कहा जाता है। इसके साथ ही मधुमेह से ग्रस्त व्यक्ति को उन तरीकों से रहने और उन पदार्थों को खाने की आदतों को परिवर्तित करने के लिए कहा जाता है जो मधुमेह उत्पन्न कर सकता हैं। इन्सुलिन प्रतिक्रिया किसे कहते हैं?
इन्सुलिन की अधिक मात्रा शरीर में पहुँच जाने पर रक्त में शर्करा की मात्रा न्यून हो जाती है। इस स्थिति को हैपोग्लैसिमिया कहते हैं तथा इस प्रतिक्रिया को इन्सुलिन प्रतिक्रिया कहा जाता है। इस प्रतिक्रिया में सिर में हल्कापन, कांपना, अशस्क्त्ता, पसीना आना एवं भूख आदि लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं। गंभीर प्रतिक्रिया की स्थिति में मधुमेह से ग्रस्त रोगी अपनी चेतना खो सकता है।
दूसरी ओर इन्सुलिन की मात्रा में कमी, अधिक मात्रा में वसा अम्लों को एकत्र कर देती है। यह पूरे तंत्र की विषाक्त बना देते हैं जिसे रक्ताम्लता कहते हैं। अंततोगत्वा यह स्थिति मधुमेही संमूर्छा में बदल जाती है और यदि तत्काल इसकी चिकित्सा न की गयी तो रोगी के जीवन को खतरा हो सकता है। साधारणत: आजकल मधुमेही संमूर्छा की स्थिति नहीं आने पाती लेकिन अपने आहार के प्रति लापरवाही बरतने एवं इन्सुलिन लेने वाले रोगियों द्वारा उसकी समुचित मात्रा न लेने से कभी भी यह स्थिति आ सकती है।
मधुमेह के बढ़ने की स्थिति किन चीजों पर निर्भर करती है?
मधुमेह के बढ़ने की स्थिति कई कारकों पर निर्भर करती है। आयु एक कारक हो सकती है। अनुवांशिक परिस्थतियाँ भी एक कारक हो सकती हैं । इसके अलावा रहन सहन की हमारी गलत आदतें भी हमारे शरीर को प्रभावित करती हैं।
अनियंत्रित मधुमेह के क्या लक्षण हैं?
प्रारम्भिक अवस्था में इसका प्राय: कोई विशेष लक्षण दिखायी नहीं देता किन्तु जब रक्त में शर्करा का स्तर बढ़ने लगता है तो निम्नलिखित में से कोई एक या अधिक लक्षण दिखायी दे सकते हैं–
-आँखों के लेंस के आकार का बदलना जिससे नेत्रज्योति धुंधली होने लगती है।
-रक्त में शर्करा का स्तर बढ़ने से बाहरी संक्रमण के प्रति शरीर का रक्षातंत्र कमजोर पड़ जाता है परिणामस्वरूप त्वचा, मूत्र एवं फेफड़ों में संक्रमण हो जाता है।
-मूत्र का प्रवाह बढ़कर बार-बार मूत्र त्याग के लिए जाना पड़ता है।
-बार-बार मूत्र त्याग करने से शरीर का संचित द्रव खर्च होने लगता है। परिणाम स्वरुप प्यास बढ़ जाती है ताकि खर्च हुए द्रव की पूर्ति की जा सके।
एक स्वस्थ व्यक्ति के रक्त में शर्करा का सामान्य स्तर क्या होना चाहिए?
ऐसे लोगों में जिन्हें मधुमेह नहीं है प्रात: खाली पेट रक्त शर्करा का स्तर (रात भर उपवास करने के पश्चात्) 90 मि.ग्रा./डीएल. तथा भोजन के पश्चात् 145 मि.ग्रा./डीएल. होना चाहिए। अनियंत्रित मधुमेह की स्थिति में यह 500 मि.ग्रा./डीएल. या इससे भी अधिक हो सकता है।
क्या मधुमेह के प्रत्येक रोगी को कभी न कभी इसकी जटिलताओं का शिकार होना पड़ सकता है?
ऐसा आवश्यक नहीं है। यदि मधुमेह को अच्छी तरह से नियंत्रित किया जाए, पर्याप्त व्यायान योगा प्राणायाम खानपान में पर्याप्त सावधानी रखी जाए तथा मोटापे आदि रोगों से बचा जाए तो अधिकांश जटिलताओं को सीमित किया जा सकता है। फिर भी पूर्ण रूप से नियंत्रित मधुमेह का रोगी भी किसी एक या अन्य जटिलताओं से पीड़ित हो सकता है।
मधुमेह के अनियंत्रित हो जाने के क्या कारण हैं?
रोगी की दिनचर्या से संबंधित बहुत सारी चीजें उसके रक्त में शर्करा के स्तर को प्रभावित कर सकती हैं। इनमें से प्रमुख हैं–
-शारीरिक श्रम का अभाव
-योग, प्राणायाम या प्रात: भमण का अभाव।
-आहार नियंत्रण का अभाव
-कतिपय औषिधियाँ
-तनाव, एवं
-संक्रमण
उपयुर्क्त कारणों से रक्त में शर्करा का स्तर बढ़कर मधुमेह को अनियंत्रित कर सकता है।
वैद्य- सुदेश यादव दिव्य
योगगुरू
Saturday, March 21, 2015
योग भगाये रोग
मोटापा :— आंजनेय आसन ही मोटापे में लाभयायक सिद्ध होगा लेकिन अगर आप करना चाहे तो ये निम्न आसन भी आप कर सकते हैं- वज्रासन, मण्डूकासन, उत्तानमण्डूसकासन, उत्तानकूर्मासन, उष्ट्रासन, चक्रासन, उत्तानपादासन, सर्वागांसन व धनुरासन, भुजंगासन, पवनमुक्तासन, कटिचक्रासन, कोणासन, उर्ध्वाहस्तोहत्तातनासन और पद्मासन आदि ।
पेट और कमर की चर्बी के लिये : लगातार ऑफिस में कुर्सी पर बैठे रहने या अन्य किसी कारण से भी अधिकतर लोगों के पेट निकल जाते हैं और कमर पर भी अच्छी-खासी चर्बी चढ जाती है। इस चर्बी को घटाने के लिए कटि चक्रासन के अलावा तोलांगुलासन भी उत्तम है, लेकिन आप चाहे तो ये आसन भी कर सकते हैं- वृक्षासन, ताड़ासन, त्रिकोणासन, पादस्तासन, आंजनेय आसन और वीरभद्रासन आदि ।
कमर दर्द :— कमर दर्द में मकरासन, भुजंगासन, हलासन और अर्ध-मत्स्येन्द्रासन के अभ्यास से कमर का दर्द मिट जाता है।
कब्ज:— कब्ज आजकल का महारोग है। यह अनियमित भोजन, मांस, फास्ट-फूड मैदा, धूम्रपान, मदिरा आदि का सेवन करने से होती है। इसके अलावा तनाव और अनिद्रा भी इसके कारण हैं। योगाभ्यास के विभिन्न आसनों और मुद्राओं के माध्यम से हम इस रोग से छुटकारा पा सकते हैं।
कब्ज के लिए :— वज्रासन, सुप्तवज्रासन, मयूरासन, पश्चिचमोत्तानासन, धनुरासन मत्स्यासन, कूर्मासन, चक्रासन, योग मुद्रा और अग्रिसार क्रिया लाभदायक रहती हैं।
झड़ते बालों के लिए :— बालों के झड़ने का कारण शहर का प्रदूषण भी है, धूल, धुआं और दूषित भोजन-पानी। इसके अलावा तनाव और अवसाद। प्रदूषण से त्वचा रूखी हो जाती है रूखी त्वचा में डैंड्रफ हो जाते हैं और यह रूखी त्वचा चर्म रोग का कारण भी बन सकती है।
वज्रासन के बाद कुर्मासन करें फिर उष्ट्रासन करें। पवनमुक्तासन के बाद मत्स्यासन करें फिर कुछ देर विश्राम करने के बाद शीर्षासन करें। आसनों को करने के बाद अनुलोम-विलोम प्राणायम करें और फिर पांच मिनट का ध्यान करें।
गिरता सेक्स लाइफ स्तर :— तनाव भरा जीवन, नशे की प्रवृत्ति और प्रदूषण भरे माहौल में पुरुषों की सेक्स लाइफ का स्तर लगातर गिरता जा रहा है। कहते हैं कि सुखी जीवन के लिए सेक्स के प्रति संतुष्टि होना आवश्यक है, जिससे जीवन के द्वंद्व मिटते हैं।
सेक्स लाइफ में सुधार के त्रिस्तर :— शरीर, प्राण और मन अर्थात आसन से शरीर, प्राणायम से प्राण और ध्यान से मन में शांति और शक्ति संचार होता है। आप यदि प्रतिदिन सूर्यनमस्कार करेंगे तो आपको अवश्य फायदा होगा।
वैद्य— एस0के0यादव
Monday, March 9, 2015
क्या हैं वात-पित्त और कफ
सबसे पहले आप हमेशा ये बात याद रखें कि शरीर मे सारी बीमारियां वात-पित्त और कफ के बिगड़ने से ही होती हैं !
सिर से लेकर छाती के बीच तक जितने रोग होते हैं वो सब कफ बिगड़ने के कारण होते हैं ! छाती के बीच से लेकर पेट और कमर के अंत तक जितने रोग होते हैं वो पित्त बिगड़ने के कारण होते हैं !और कमर से लेकर घुटने और पैरों के अंत तक जितने रोग होते हैं वो सब वात बिगड़ने के कारण होते हैं !
हमारे हाथ की कलाई मे ये वात-पित्त और कफ की तीन नाड़ियाँ होती हैं ! आपने एक सप्ताह पहले क्या खाया एक दिन पहले क्या खाया -दो दिन पहले क्या खाया यह सब हमारी नाडियों से ज्ञात हो जाता है !
वात -पित्त— कफ दिखने मे कैसे होते हैं ?
फिलहाल तो आप इतना जान लीजिये कि कफ और पित्त लगभग एक जैसे होते हैं ! आम भाषा मे नाक से निकलने वाली बलगम को कफ कहते हैं ! कफ थोड़ा गाढ़ा और चिपचिपा होता है ! मुंह मे से निकलने वाली बलगम को पित्त कहते हैं ! ये कम चिपचिपा और द्रव्य जैसा होता है ! और शरीर से निकले वाली वायु को वात कहते हैं ! ये अदृश्य होती है !
कई बार पेट मे गैस बनने के कारण सिर दर्द होता है तो इसे आप कफ का रोग नहीं कहेंगे इसे पित्त का रोग कहेंगे ! क्यूंकि पित्त बिगड़ने से गैस हो रही है और सिर दर्द हो रहा है ! ये ज्ञान बहुत गहरा है खैर आप इतना याद रखें कि इस वात -पित्त और कफ के संतुलन के बिगड़ने से ही सभी रोग आते हैं ! और ये तीनों ही मनुष्य की आयु के साथ अलग— अलग ढंग से बढ़ते हैं ! बच्चे के पैदा होने से 14 वर्ष की आयु तक कफ के रोग ज्यादा होते है ! बार बार खांसी ,सर्दी ,छींके आना आदि होगा ! 14 वर्ष से 50 साल तक पित्त के रोग सबसे ज्यादा होते हैं बार— बार पेट दर्द करना,गैस बनना,खट्टी खट्टी डकारे आना आदि ! और उसके बाद बुढ़ापे मे वात के रोग सबसे ज्यादा होते हैं घुटने दुखना,जोड़ो का दर्द आदि ।
भारत केे ऋषि वाग्बट्ट ने अष्टांग हृदयं किताब लिखी ! वो ऋषि 135 साल तक की आयु तक जीवित रहे थे ! अष्टांग हृदयं मे वाग्बट्टजी कहते हैं की जिंदगी मे वात्त,पित्त और कफ संतुलित रखना ही सबसे अच्छी कला है और कौशल्य है सारी जिंदगी प्रयास पूर्वक आपको एक ही काम करना है की हमारा वात्त,पित्त और कफ नियमित रहे,संतुलित रहे और सुरक्षित रहे|जितना चाहिए उतना वात्त रहे,जितना चाहिए उतना पित्त रहे और जितना चाहिए उतना कफ रहे|तो जितना चाहिए उतना वात्त,पित्त और कफ रहे उसके लिए क्या करना है
उसके लिए उन्होने 7000 सूत्र लिखे हैं उस किताब मे !
उसमे सबसे महत्व पूर्ण और पहला सूत्र है :—
भोजनान्ते विषं वारी (मतलब खाना खाने के तुरंत बाद पानी पीना जहर पीने के बराबर है | )
अब समझते हैं क्या कहा वाग्बट्टजी ने !
कभी भी खाना खाने के तुरंत बाद पानी नहीं पीना ! अब आप कहेंगे हम तो हमेशा यही करते हैं ! 99 प्रतिशत लोग ऐसे होते है जो पानी लिए बिना खाना नहीं खाते है |पानी पहले होता है खाना बाद मे होता है |बहुत सारे लोग तो खाना खाने से ज्यादा पानी पीते है दो-चार रोटी के टुकडो को खाया फिर पानी पिया,फिर खाया-फिर पानी पिया !
क्यों नहीं पीना है ?
ये जानना बहुत जरुरी है हम पानी क्यों ना पीये खाना खाने के बाद इसका क्या कारण है ?
बात ऐसी है की हमारा जो शरीर है शरीर का पूरा केंद्र है हमारा पेट|ये पूरा शरीर चलता है पेट की ताकत से और पेट चलता है भोजन की ताकत से|जो कुछ भी हम खाते है वो ही हमारे पेट की ताकत है |हमने दाल,सब्जी,रोटी,दही,लस्सी, दूध,छाझ लस्सी फल आदि|ये सब कुछ भोजन के रूप मे हमने ग्रहण किया ये सब कुछ हमको उर्जा देते है और पेट उस उर्जा को आगे ट्रांसफर करता है |आप कुछ भी खाते है पेट उसके लिए उर्जा का आधार बनता है |अब हम खाते है तो पेट मे सब कुछ जाता है|पेट मे एक छोटा सा स्थान होता है जिसको हम हिंदी मे कहते है अमाशय|उसी स्थान का संस्कृत नाम है जठर|उसी स्थान को अंग्रेजी मे कहते है epigastrium |ये एक थैली की तरह होता है और यह जठर हमारे शरीर मे सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि सारा खाना सबसे पहले इसी मे आता है ये |बहुत छोटा सा स्थान हैं इसमें अधिक से अधिक 350GMS खाना आ सकता है |हम कुछ भी खाते सब ये अमाशय मे आ जाता है|
अब अमाशय मे क्या होता है खाना जैसे ही पहुँचता है तो यह भगवान की बनाई हुई व्यवस्था है जो शरीर मे है की तुरंत इसमें आग(अग्नि) जल जाती है |आमाशय मे अग्नि प्रदीप्त होती है उसी को कहते हे जठराग्नि|ये जठराग्नि है वो अमाशय मे प्रदीप्त होने वाली आग है |ये आग ऐसी ही होती है जेसे रसोई गैस की आग|आप की रसोई गैस की आग है ना की जैसे आपने स्विच ओन किया आग जल गयी|ऐसे ही पेट मे होता है जैसे ही आपने खाना खाया की जठराग्नि प्रदीप्त हो गयी |यह ऑटोमेटिक है,जैसे ही अपने रोटी का पहला टुकड़ा मुँह मे डाला की इधर जठराग्नि प्रदीप्त हो गई|ये अग्नि तब तक जलती हे जब तक खाना पचता है |आपने खाना खाया और अग्नि जल गयी अब अग्नि खाने को पचाती है |वो ऐसे ही पचाती है जैसे रसोई गैस|आपने रसोई गैस पर बरतन रखकर थोडा दूध डाल दिया और उसमे चावल डाल दिया तो जब तक अग्नि जलेगी तब तक खीर बनेगी|इसी तरह अपने पानी डाल दिया और चावल डाल दिए तो जब तक अग्नि जलेगी चावल पकेगा|
अब अपने खाते ही गटागट पानी पी लिया और खूब ठंडा पानी पी लिया|और कई लोग तो बोतल पे बोतल पी जाते है |अब होने वाला एक ही काम है जो आग(जठराग्नि) जल रही थी वो बुझ गयी|आग अगर बुझ गयी तो खाने की पचने की जो क्रिया है वो रुक गयी|अब हमेशा याद रखें खाना पचने पर हमारे पेट मे दो ही क्रिया होती है |एक क्रिया है जिसको हम कहते हे Digation और दूसरी है fermentation फर्मेंटेशन का मतलब है सडना और डायजेशन का मतलब हे पचना|
आयुर्वेद के हिसाब से आग जलेगी तो खाना पचेगा,खाना पचेगा तो उसका रस बनेगा|जो रस बनेगा तो उसी रस से मांस,मज्जा,रक्त,वीर्य,हड्डिया,मल,मूत्र और अस्थि बनेगा और सबसे अंत मे मेद बनेगा|ये तभी होगा जब खाना पचेगा|
अब ध्यान से पढ़े इन शब्दों को मांस की हमें जरुरत है हम सबको,मज्जा की जरुरत है,रक्त की भी जरुरत है,वीर्य की भी जरुरत है,अस्थि भी चाहिए,मेद भी चाहिए|यह सब हमें चाहिए|जो नहीं चाहिए वो मल नहीं चाहिए और मूत्र नहीं चाहिए|मल और मूत्र बनेगा जरुर ! लेकिन वो हमें चाहिए नहीं तो शरीर हर दिन उसको छोड़ देगा|मल को भी छोड़ देगा और मूत्र को भी छोड़ देगा बाकि जो चाहिए शरीर उसको धारण कर लेगा|
ये तो हुई खाना पचने की बात अब जब खाना सड़ेगा तब क्या होगा ?
अगर आपने खाना खाने के तुरंत बाद पानी पी लिया तो जठराग्नि नहीं जलेगी,खाना नहीं पचेगा और वही खाना फिर सड़ेगा|और सड़ने के बाद उसमे जहर बनेंगे|
खाने के सड़ने पर सबसे पहला जहर जो बनता है वो हे यूरिक एसिड (uric acid)| कई बार आप डॉक्टर के पास जाकर कहते है की मुझे घुटने मे दर्द हो रहा है,मुझे कंधे-कमर मे दर्द हो रहा है तो डॉक्टर कहेगा आपका यूरिक एसिड बढ़ रहा है आप ये दवा खाओ,वो दवा खाओ यूरिक एसिड कम करो|यह यूरिक एसिड विष ( जहर ) है और यह इतना खतरनाक विष है की अगर अपने इसको कन्ट्रोल नहीं किया तो ये आपके शरीर को उस स्थिति मे ले जा सकता है की आप एक कदम भी चल ना सके|आपको बिस्तर मे ही पड़े रहना पड़े पेशाब भी बिस्तर मे करनी पड़े |
और एक दूसरा उदाहरण खाना जब सड़ता है तो यूरिक एसिड जैसा ही एक दूसरा विष बनता है जिसको हम कहते हैं LDL (Low Density lipoprotive)माने खराब कोलेस्ट्रोल(cholesterol )|जब आप ब्लड प्रेशर(BP) चैक कराने डॉक्टर के पास जाते हैं तो वो आपको कहता है (HIGH BP )हाय बीपी है आप पूछोगे कारण बताओ ? तो वो कहेगा कोलेस्ट्रोल बहुत ज्यादा बढ़ा हुआ है |आप ज्यादा पूछोगे की कोलेस्ट्रोल कौन सा बहुत है ? तो वो आपको कहेगा LDL बहुत है |
इससे भी ज्यादा खतरनाक विष है वो है VLDL(Very Low Density lipoprotive)|ये भी कोलेस्ट्रॉल जैसा ही विष है |अगर VLDL बहुत बढ़ गया तो आपको भगवान भी नहीं बचा सकता| खाना सड़ने पर और जो जहर बनते है उसमे एक और विष है जिसको अंग्रेजी मे हम कहते है triglycerides| जब भी डॉक्टर आपको कहे की आपका triglycerides बढ़ा हुआ हे तो समझ लीजिए की आपके शरीर मे विष निर्माण हो रहा है |
तो कोई यूरिक एसिड के नाम से कहे,कोई कोलेस्ट्रोल के नाम से कहे,कोई LDL - VLDL के नाम से कहे समझ लीजिए की ये विष हैं और ऐसे विष 103 है |ये सभी विष तब बनते है जब खाना सड़ता है |
मतलब समझ लीजिए किसी का कोलेस्ट्रोल बढ़ा हुआ है तो एक ही मिनिट मे ध्यान आना चाहिए की खाना पच नहीं रहा है,कोई कहता हे मेरा triglycerides बहुत बढ़ा हुआ है तो एक ही मिनिट मे डायग्नोसिस कर लीजिए आप ! की आपका खाना पच नहीं रहा है |कोई कहता है मेरा यूरिक एसिड बढ़ा हुआ है तो एक ही मिनिट लगना चाहिए समझने मे की खाना पच नहीं रहा है |
क्योंकि खाना पचने पर इनमे से कोई भी जहर नहीं बनता|खाना पचने पर जो बनता है वो है मांस,मज्जा,रक्त,वीर्य,हड्डिया,मल,मूत्र,अस्थि और खाना नहीं पचने पर बनता है यूरिक एसिड,कोलेस्ट्रोल,LDL-VLDL| और यही आपके शरीर को रोगों का घर बनाते है !
पेट मे बनने वाला यही जहर जब ज्यादा बढ़कर खून मे आते है ! तो खून दिल की नाड़ियो मे से निकल नहीं पाता और रोज थोड़ा— थोड़ा कचरा जो खून मे आया है इकट्ठा होता रहता है और एक दिन नाड़ी को ब्लॉक कर देता है जिसे आप heart attack कहते हैं !
तो हमें जिंदगी मे ध्यान इस बात पर देना है कि जो हम खा रहे हे वो शरीर मे ठीक से पचना चाहिए और खाना ठीक से पचना चाहिए इसके लिए पेट मे ठीक से आग(जठराग्नि) प्रदीप्त होनी ही चाहिए|क्योंकि बिना आग के खाना पचता नहीं है और खाना पकता भी नहीं है |रसोई मे आग नहीं है तो आप कुछ नहीं पका सकते और पेट मे आग नहीं है आप कुछ नहीं पचा सकते|
महत्व की बात खाने को खाना नहीं खाने को पचाना है |आपने क्या खाया कितना खाया वो महत्वपूर्ण नहीं है। लेकिन आपने पचाया कितना वो महत्व है | खाना पच नहीं रहा तो समझ लीजिये विष निर्माण हो रहा है शरीर में ! और यही सारी बीमारियो का कारण है ! तो खाना अच्छे से पचे इसके लिए वाग्भट्ट जी ने सूत्र दिया !
भोजनान्ते विषं वारी (मतलब खाना खाने के तुरंत बाद पानी पीना जहर पीने के बराबर है )
इसलिए खाने के तुरंत बाद पानी कभी मत पिये !
अब आपके मन मे सवाल आएगा कितनी देर तक नहीं पीना ?
तो 1 घंटे 48 मिनट तक नहीं पीना ! अब आप कहेंगे इसका क्या calculation हैं ?
बात ऐसी है ! जब हम खाना खाते हैं तो जठराग्नि द्वारा सब एक दूसरे मे मिक्स होता है और फिर खाना पेस्ट मे बदलता है ! पेस्ट मे बदलने की क्रिया होने तक 1 घंटा 48 मिनट का समय लगता है ! उसके बाद जठराग्नि कम हो जाती है ! (बुझती तो नहीं लेकिन बहुत धीमी हो जाती है )
पेस्ट बनने के बाद शरीर मे रस बनने की परिक्रिया शुरू होती है ! तब हमारे शरीर को पानी की जरूरत होती हैं तब आप जितना इच्छा हो उतना पानी पिये !
जो बहुत मेहनती लोग है (खेत मे हल चलाने वाले,रिक्शा खींचने वाले पत्थर तोड़ने वाले ! उनको 1 घंटे के बाद ही रस बनने लगता है उनको एक घंटे बाद पानी पीना चाहिए !
अब आप कहेंगे खाना खाने के पहले कितने मिनट तक पानी पी सकते हैं ? तो खाना खाने के 45 मिनट पहले तक आप पानी पी सकते हैं ! अब आप पूछेंगे ये 45 मिनट का क्या calculation ? बात ऐसी है जब हम पानी पीते हैं तो वो शरीर के प्रत्येक अंग तक जाता है ! और अगर बच जाये तो 45 मिनट बाद मूत्र पिंड तक पहुंचता है ! तो पानी - पीने से मूत्र पिंड तक आने का समय 45 मिनट का है ! तो आप खाना खाने से 45 मिनट पहले ही पानी पिये !
वैद्य एस0के0यादव
Sunday, March 8, 2015
अर्थराइटिस
लक्षण
-जोड़ों में सूजन, अकड़न या लालिमा होना।
-थकावट महसूस करना।
-तेज बुखार होना।
-यह रोग कम आयु में प्रारंभ हो जाता है, जिससे जल्दी ही रीढ़ की हड्डी में विकार और सूजन बढ़ जाती है। अंतत: रीढ़ की हड्डी का स्पॉन्डिलाइटिस हो जाता है।
हरे धनिये से करें इलाज
हरा धनिया मसाले के रूप में व भोजन को सजाने या सुंदरता बढ़ाने के साथ ही चटनी के रूप में भी खाया जाता है। हमारे बड़े-बुजूर्ग इसके औषधिय गुणों को जानते थे इसीलिए प्राचीन समय से ही धनिए का उपयोग भारतीय भोजन का स्वाद बढ़ाने के लिए उपयोग में लाया जाता रहा है। ज हम आपको बताने जा रहे हैं हरे धनिए के कुछ ऐसे ही औषधिय गुणों के बारे में...
- इसके एंटीसेप्टिक और एंटीऑक्सीडेंट गुण पाया जाता है इसीलिए अगर चेहरे पर मुंहासे हो तो धनिए की हरी पत्तियों को पीसकर उसमें चुटकीभर हल्दी पाउडर मिलाकर लगाने से लाभ होता है। यह त्वचा की विभिन्न समस्याओं जैसे एक्जीमा, सुखापन और एलर्जी से राहत दिलवाता है।
- हरा धनिया वातनाशक होने के साथ-साथ पाचनशक्ति भी बढ़ाता है। धनिया की हरी पत्तियां पित्तनाशक होती हैं। पित्त या कफ की शिकायत होने पर दो चम्मच धनिया की हरी-पत्तियों का रस सेवन करना चाहिए।
- धनिया की पत्तियों में एंटी टय़ुमेटिक और एंटी अर्थराइटिस के गुण होते हैं। यह सूजन कम करने में बहुत मददगार होता है, इसलिए जोड़ों के दर्द में राहत देता है।
- आयरन से भरपूर होने के कारण यह एनिमिया को दूर करने में मददगार होता है। एंटी ऑक्सीडेंट, विटामिन ए, सी और कई मिनरलों से भरपूर धनिया कैंसर से बचाव करता है।
- हरा धनिया की चटनी बनाकर खाई जाती है क्योंकि जो इसको खाने से नींद भी अच्छी आती है। डायबिटीज से पीडि़त व्यक्ति के लिए तो यह वरदान है। यह इंसुलिन बढ़ाता है और रक्त का ग्लूकोज स्तर कम करने में मदद करता है।
वैद्य एस0के0यादव
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